सरार्ती बंदर

टिंकू: (हँसते हुए) हा! हा! आज का सबसे मीठा आम मैंने पकड़ा! अब इसे खाकर सबको चिढ़ाऊंगा!

(धीरू कछुआ धीरे-धीरे नदी के किनारे घास पर चल रहा है। वह अपनी मंज़िल पर पहुँचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी चाल धीमी है।)

धीरू: (थकी हुई आवाज़ में, खुद से) बस थोड़ा और... मुझे उस दूसरी तरफ़ की स्वादिष्ट हरी पत्तियां खानी हैं।

टिंकू: (धीरू को देखकर, मज़ाक उड़ाते हुए) अरे वाह! देखो तो कौन आ रहा है! हमारे "रॉकेट" धीरू भाई! कहाँ जा रहे हो भाई, क्या रेस जीत कर आ रहे हो?

(टिंकू आम का एक छोटा टुकड़ा धीरू के पास ज़मीन पर गिरा देता है।)

टिंकू: लो, यह मेरी तरफ़ से मिठाई! लेकिन इसे पकड़ने में तो तुम्हें एक घंटा लग जाएगा!

धीरू: (बिना रुके, शांत होकर) नमस्ते, टिंकू। तुम बहुत शक्तिशाली और तेज़ हो, लेकिन अपनी ताकत को दूसरों को परेशान करने में क्यों लगाते हो?

टिंकू: (चौंककर) हा हा! परेशान करना? मैं तो बस मस्ती कर रहा हूँ! तुम जैसे धीरे चलने वालों को तो मस्ती के लिए ही बनाया गया है!

(टिंकू एक और आम तोड़ता है और मज़ाक में उसे हवा में उछालता है।)

दृश्य 2: नदी पार करने की चुनौती
समय: दोपहर स्थान: नदी का किनारा

(टिंकू नीचे उतरता है और नदी के किनारे खड़ा हो जाता है। धीरू नदी पार करने की तैयारी कर रहा है।)

टिंकू: (अपनी छाती ठोकते हुए) अब बताओ, धीरू। तुम उस तरफ़ कैसे जाओगे? मैं तो पेड़ की डाली से कूदकर जा सकता हूँ, लेकिन तुम?

धीरू: (पानी में घुसते हुए) मैं तैरकर जाऊँगा। मुझे पता है कि मैं धीमा हूँ, लेकिन मैं नदी पार कर सकता हूँ।

टिंकू: (उत्साह से) मुझे एक विचार आया! हम एक खेल खेलते हैं! तुम तैरकर जाओगे और मैं पेड़ की डालियों से झूलकर, बिना ज़मीन छुए, उस पार जाने की कोशिश करूँगा! देखते हैं कौन पहले पहुँचता है!

धीरू: (मुस्कुराते हुए) ठीक है, टिंकू। शर्त मंज़ूर है।

(धीरू धीरे-धीरे तैरना शुरू करता है। टिंकू बहुत तेज़ी से एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर झूलना शुरू करता है। वह बहुत आगे निकल जाता है।)

टिंकू: (आगे निकलकर चिल्लाता है) हा हा! मैंने कहा था न! तुम कभी नहीं जीत सकते!

(अचानक, टिंकू जिस डाल पर खड़ा है, वह बहुत पुरानी और कमज़ोर होती है। वह तेज़ी से चरमराहट की आवाज़ करती है।)

टिंकू: (डरकर) ओहो! यह क्या हुआ!

(डाली टूट जाती है! टिंकू ज़ोरदार 'छपाक' की आवाज़ के साथ नदी में गिर जाता है! टिंकू पानी में हाथ-पैर मारता है। उसे तैरना नहीं आता! उसकी लाल टोपी तैर रही है।)

टिंकू: (घबराकर चिल्लाता है) बचाओ! बचाओ! मुझे तैरना नहीं आता!

दृश्य 3: मदद और दोस्ती
समय: दोपहर स्थान: नदी के बीच

(धीरू कछुआ, जो अब तक धीरे-धीरे तैर रहा था, आवाज़ सुनकर पलटता है। वह देखता है कि टिंकू डूब रहा है।)

धीरू: (शांति से) रुको, टिंकू! घबराओ मत!

(धीरू तेज़ी से टिंकू की ओर तैरता है और उसके पास पहुँच जाता है।)

धीरू: जल्दी करो! मेरी पीठ पर चढ़ जाओ! मैं तुम्हें किनारे तक ले चलूँगा।

(टिंकू किसी तरह धीरू की मज़बूत पीठ पर चढ़ जाता है। धीरू आराम से उसे खींचते हुए किनारे तक ले जाता है।)

टिंकू: (भीगी हुई आवाज़ में, शर्मिंदा होकर) धीरू, तुम... तुमने मेरी जान बचाई। मैं तुम्हारा मज़ाक उड़ा रहा था और तुम...

धीरू: (किनारे पर रुककर) शक्ति और गति हमेशा काम नहीं आती, टिंकू। ज़रूरत के समय साथ देना और समझदारी ज़रूरी होती है।

टिंकू: (नीचे उतरकर) तुम सही कह रहे हो, धीरू। मैं अब कभी किसी को छोटा नहीं समझूँगा और न ही किसी का मज़ाक उड़ाऊंगा। तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो। (वह अपनी भीगी हुई लाल टोपी धीरू को दिखाता है) यह टोपी अब से तुम्हें याद दिलाएगी कि हम दोस्त हैं!

धीरू: (मुस्कुराते हुए) ठीक है, टिंकू! अब चलो, मुझे भूख लगी है!

(टिंकू और धीरू हँसते हैं। टिंकू नदी के पार पहुँचने के लिए धीरू के साथ-साथ चलता है, इस बार उसकी गति पर कोई मज़ाक नहीं करता।)

नैतिक संदेश (Voice Over): कभी भी किसी को उसकी कमज़ोरी के लिए नहीं चिढ़ाना चाहिए। हर किसी के पास अपनी ख़ासियत होती है।

(पर्दा गिरता है। The End)

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